न्यायपालिका को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है, जो न्याय और निष्पक्षता का प्रतीक है। लेकिन हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट के जज यशवंत वर्मा के घर हुई घटना ने इस विश्वास को हिला दिया है। मार्च 2025 में उनके आवास में लगी आग को बुझाने पहुंची फायर ब्रिगेड को एक कमरे में नोटों का ढेर मिला, जिसमें से कई जल चुके थे। यह खबर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची, जिसके बाद मुख्य न्यायाधीश ने तुरंत जांच के आदेश दिए। यह मामला भारतीय न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की गहरी जड़ों की ओर इशारा करता है।
यह पहली बार नहीं है जब न्यायपालिका पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हों। निचली अदालतों से लेकर उच्च न्यायालयों तक, रिश्वतखोरी और पक्षपात के मामले समय-समय पर सामने आते रहे हैं। लेकिन जज वर्मा का मामला इसलिए खास है क्योंकि यह एक उच्च पदस्थ जज से जुड़ा है और सबूत इतने स्पष्ट हैं कि इसे नजरअंदाज करना मुश्किल है। सवाल उठता है—क्या यह नोटों का ढेर कानूनी आय से आया, या यह रिश्वत का परिणाम है? जांच जारी है, लेकिन इस घटना ने आम जनता के मन में संदेह पैदा कर दिया है।
न्यायपालिका में भ्रष्टाचार कोई नई बात नहीं है। साल 2017 में जस्टिस सी.एस. कर्णन को सुप्रीम कोर्ट के जजों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाने के लिए contempt of court के तहत सजा दी गई थी। 2023 में इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व जज एस.एन. शुक्ला पर CBI ने आय से अधिक संपत्ति का केस दर्ज किया था। ये मामले दर्शाते हैं कि समस्या सिस्टम में गहरे तक फैली है। देरी से न्याय, अपारदर्शी नियुक्तियां, और जवाबदेही की कमी इसके प्रमुख कारण हैं। जब न्याय देने वाले ही संदेह के घेरे में हों, तो आम आदमी का भरोसा कैसे बरकरार रहेगा?
इस समस्या का समाधान पारदर्शिता और कड़े नियमों में है। जजों की नियुक्ति और उनकी संपत्ति की जांच के लिए स्वतंत्र तंत्र बनाना जरूरी है। साथ ही, केसों की सुनवाई में तेजी लाकर रिश्वत के अवसर कम किए जा सकते हैं। uncorrupt.org पर हम ऐसे मुद्दों को उजागर करने और सुधार के रास्ते सुझाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। इस तरह की घटनाएं हमें याद दिलाती हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई हर स्तर पर जारी रखनी होगी।